Friday, 19 January 2018

बेपरवाह सा घूमता था
आज का आज ही में जीता था
औरों को नज़रअंदाज़ कर
वो ख़ुद ही को शीद्दत से चाहता था


ना किसी की सुनता, ना कभी कल की सोचता था
फिरता तो था आवारा सा, पर वो आवारा नहीं मनमौजी था

देखा उसे पहली बार, तो कुछ पागल सा वो जान पड़ा
न आँखों में सपने न दिल में उमंग, ज़रा भटका सा वो जान पड़ा

फिर ख़ुद की ओर  इठला कर देखा
और सोचा, हम भाग रहे हैं, चलो इसे भी भागते हैं
खुशियों की दौड़ में यह पीछे ना रह जाये
ज़रा इसके कदमों में भी पंख लगते हैं

अरे सुनो! तुम क्या चलते हो
खुश रहना है कल, तो चलो आज दौड़ो
ऐसे उन्मुक्त हो कर ना रहो बंधू
सीधे देखो और चलो हमारे साथ दौड़ो

तालियाँ बजाई  उसने और कहा,
 क्या बेमिसाल दौड़ते हो
पर हम ठहरे भटकैये भैया
हमारे पीछे तुम क्यों रुकते हो

उसकी ज़िद थी चलना,
 तो दौड़ाने की हमने भी ठानी थी
हमारे साथ चले हमी  जैसा सिकंदर
ये तो भैया अपनी भी मनमानी थी


कह कह कर उसे हमने बताया इस दौड़ के अंत में एक कल है
जो एक ना एक दिन ज़रूर आएगा
आज चाहे उसे नज़रअंदाज़ कर लो
 पर आज ना भागे तो कल तुम्हें  तबाह कर जाएगा

फिर कैसे रहोगे ख़ुश  तुम
और कैसे अपनी मर्ज़ी से जियोगे
समय की लाठी जब पड़ेगी
तो ना हसोगे और ना रो सकोगे

कुछ दिन लगे ज़रूर
पर हमारी बातें  थीं, कैसे ना मनाता
चल पड़ा फिर वो भी भागने
पूरे जोश से कूदता फांदता

उसे देख कर फिर खुश हुए हम
चलो एक भटके को रास्ता तो दिखा दिया
फिर हम भी दौड़ पड़े उसी के संग
उसे तो दौड़ाया, थोड़ा खुद को भी हौसला दिया

न जाने पर कौन सी बात थी उसके अल्हडपन में
थोड़ा प्यार उसकी शरारतों  से हम भी कर बैठे थे
उन आँखों की चमक और  बेज़रार हसी में
कहीं  ख़ुद  ही ख़ुद  को खो बैठे थे

उसकी एक एक बात याद कर
अब मन ही मन मुसकाते थे
हम भी दौड़ में थे, ये भूल ही गए
उसके दिए हुए गीत आहिस्ता से गुनगुनाते थे

सोचा चलो कह ही दे उसे
कि तुम्हारी दीवानगी से प्यार हो गया है  हमे
चाहते तो थे तुम्हें सुधारना
पर अनजाने में तुम्हीं  से प्यार हो गया है हमें


ऐ सुनो! हमने चिल्लाया, कुछ बहोत ज़रूरी कहना है
अभी नहीं! उसने कहा, हमे भागने दो हमें सबसे आगे रहना है

उन आँखों में आज एक लक्ष्य तो दिखा
पर उनकी चमक आज कहीं ग़ायब थी
गीतों से भरे उन होठों  पर
सिर्फ़ जंग की बातें  क़ायम थीं

बड़ी शिद्दत से दौड़ रहा था वो
लहू की बुँदे भी कहा उसकी रफ़्तार में सेंध लगाती थी
जहाँ  मिला था उसके बहोत आगे पहुँच गया था वो
फ़िर भी उसके चेहरे पर मुस्कान थम नहीं पाती थी

चोट खाता, गिरता, लड़खड़ाता वो
पर बिना हारे उसकी दौड़ जारी थी
मस्ती और ख़ुशी उसके रोम-रोम में थी
पर आज वो सिर्फ उसकी कल्पनाओं में बाक़ी थी

कल की ख़ुशी पाने के लिए
आज वो कड़वे आँसू भी पी रहा था
उसे देख कर हम  हँसना सीखें
और आज वो हमारे ही आँसू रो रहा था

किस मुँह से कहते, तुम सही थे, ग़लत थे हम
तुम आज में जी रहे थे खुशियाँ, हम आज में जी रहे थे ग़म

ये सोच हमने तुमको भी दी
कि आज को कुर्बान कर, सुंदर सा कल लाना है
पर हम ही ये समझ ना पाए
कल भी एक आज होगा, और हर दिन एक नया आज आना है

जिन ख़ुशियों के ख़्वाब हमने उस पार दिखाए
तुम तो उन्हें यहीं जी लेते थे
बहुत की चाह नहीं थी तुम्हें
इसलिए थोड़े में भी बड़े मज़े से रहते थे

वो तो गया अपनी मंज़िल तलाशने दौड़ता हुआ
पर हम ख़ुदको  कैसे माफ़ कर पाएंगे
उस हसते-खेलते को क़ामयाबी  का भूखा बना कर
हम ख़ुद ही ख़ुद को कोसते रह जाएंगे ||

|| Sshree||


No comments:

Post a Comment