दूरियाँ दिलों में नहीं
ख़यालों में यूं बढ़ जाती हैं
के चोट खाने के डर से ही
चोट लग जाती है
रस्से सी लगने वाली
नाज़ुक डोर वो तब नज़र आती है
जब दोनों हाथों ने थामी हो
और एक ओर से खेंची जाती है
उड़ता हुआ जब आ कर बैठे
वो भॅवर उस नन्हें फूल पे
फ़िर नन्हें हाथों से सेहला कर उसे
उसकी रूह तक उसे सवार दे
रिश्ता वो रूह से रूह का
परवान चढ़ कर बोलता है
दूरियों का निशान न कोई
और ना कोई आँसू होता है
फिर डर कर उसी बंधन से
धीरे धीरे भवर कदम पीछे लेता है
और वहीं थमा फूल
अपने ही वज़ूद पर रोता है
दूरियाँ दिलों में नहीं
ख़यालों में यूं बढ़ जाती हैं
के चोट खाने के डर से ही
गेहरी चोट लग जाती है
||Sshree||
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