Wednesday, 8 November 2017

दूरियाँ दिलों में नहीं 
ख़यालों  में यूं बढ़ जाती हैं 
के चोट खाने के डर से ही 
चोट लग जाती है 

रस्से सी लगने वाली 
नाज़ुक डोर वो  तब नज़र आती है 
जब दोनों हाथों ने थामी हो 
और एक ओर से खेंची जाती है 

 उड़ता  हुआ जब आ कर बैठे 
वो भॅवर उस नन्हें फूल पे  
फ़िर नन्हें हाथों से सेहला कर उसे 
उसकी रूह तक उसे सवार दे 

रिश्ता वो रूह से रूह का 
परवान चढ़ कर बोलता है 
दूरियों का निशान न कोई 
और ना कोई आँसू होता है 

फिर डर कर उसी बंधन से 
धीरे धीरे भवर कदम पीछे लेता है 
और वहीं थमा फूल 
अपने ही वज़ूद पर रोता है 

दूरियाँ दिलों में नहीं 
ख़यालों  में यूं बढ़ जाती हैं 
के चोट खाने के डर से ही 
गेहरी चोट लग जाती है 

||Sshree|| 






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