Wednesday, 8 November 2017

दूरियाँ दिलों में नहीं 
ख़यालों  में यूं बढ़ जाती हैं 
के चोट खाने के डर से ही 
चोट लग जाती है 

रस्से सी लगने वाली 
नाज़ुक डोर वो  तब नज़र आती है 
जब दोनों हाथों ने थामी हो 
और एक ओर से खेंची जाती है 

 उड़ता  हुआ जब आ कर बैठे 
वो भॅवर उस नन्हें फूल पे  
फ़िर नन्हें हाथों से सेहला कर उसे 
उसकी रूह तक उसे सवार दे 

रिश्ता वो रूह से रूह का 
परवान चढ़ कर बोलता है 
दूरियों का निशान न कोई 
और ना कोई आँसू होता है 

फिर डर कर उसी बंधन से 
धीरे धीरे भवर कदम पीछे लेता है 
और वहीं थमा फूल 
अपने ही वज़ूद पर रोता है 

दूरियाँ दिलों में नहीं 
ख़यालों  में यूं बढ़ जाती हैं 
के चोट खाने के डर से ही 
गेहरी चोट लग जाती है 

||Sshree|| 






Friday, 3 November 2017

पहली बारिश की ये ठंडक 
दे जाती है दिल पे अनदेखी सी दस्तक 
ये मदमस्त फुहारें 
दे जाती हैं दिल को बहारें 

ना जाने क्या कहती है ये बारिश 
क्यों  लगती है इसकी मस्ती एक अनदेखी सी साज़िश 

कुछ अनजान से पलों की सौगात लाए 
इन अंधियारों में उजालो के सपने  सजाए 

क्यू विश्वास जगाए एक नयी शुरुवात की 
क्यू  उम्मीद जगाये  सौगात की 

यूँ तो ये सिर्फ है मौसम की एक करवट 
जानूं मैं भी ये नहीं है मेरे हसरतो की  सूरत 

पर न जाने क्युं बारिश 
राहत देती है पहले प्यार के एहसास सा 
सुकून देती है माँ की गोद में आराम सा 
उम्मीद देती है अमावस  के बाद खिले चाँद सा 

कुछ तो राज़ ज़रूर है इन बूंदों का 
जो भीनी सी ख़ुशी ये हर लैब पर दे जाए 
कुछ तो जादू है इसके अंदाज़ का 
जो चाहे-नचाहे हर दिल को छू जाए 

चलो आज मैं भी 
हो जाऊ इस साज़िश में शामिल 
गीतों से फिर समेत लूँ 
वो यादें जो हुई धूमिल 
बुन लू ख्वाबों का वो महल 
जो इस मौसम सा सायना हो 
एक ऐसे कल के इंतज़ार में गाऊ 
जो इस बारिश सा ही सुहाना हो 
||Sshree|| 

जाताना तो फ़ितरत   में
हमारे  भी नहीं था 
पर उनको इरादों में नहीं 
अलफ़ाज़ों में यकीं था 

क़सूर  उनका भी नहीं 
ज़माने की पुकार ही यही थी 
इसलिए ख़ामोश रहने में 
 हार भी तय मेरी थी 

||Sshree|| 
कुछ कहना है कुछ सुनना है 
कभी कुछ कर जाना है कभी थम जाना है 
लोग क्या कहेंगे ' इसकी जकड में 
मुझे अब और नहीं रहना है 

कभी दौड़ती हुई दुनिया के साथ दौड़ 
चीते सा सबको पछाड़ जाना है 
कभी उसी दौड़ में इठलाते हुए  चल कर 
सबको खुद से आगे देख मुस्काना है 

कभी लड़ लड़ कर मर जाना है 
कभी ख़ामोशी से हार कर किसी और को जिताना है
उस मासूम परिंदे की तरह फिर 
आसमान में एक नयी ऊंचाई को पाना है 

कभी तारा बन कर जगमगाना है 
और कभी टूट कर   धूमिल हो जाना है 

फिर गिर कर उठना  और उठ कर सम्हल जाना है 
कुछ खोना है कुछ पाना है 
'लोग क्या कहेंगे ' इसकी जकड से आज़ाद हो 
मुझे बेबाक हो कर जीना है 

||Sshree|| 


मिजाज़ से मैं आवारा हूँ आवारा ही था 

इन तंग गलियों में मैंने कब सुकून पाया है 
शरीफों के बीच झूठी शराफ़त में मैंने ख़ुद को खोया खोया पाया है 

मैं  तो  परिंदा हूँ 
जिसने आज एक डाल को अपनाया है 
फिर छोड़ कर उस  डाल  को 
आसमान में घर बनाया है 

खोखले समाज और उसकी बातों का 
मैंने खुल के मज़ाक उड़ाया है 
नहीं हूँ मैं वो फूल जो हर वक़्त अपनी खुशबू बिखेरे 
कभी किसी से दिल से जुड़ा और वक़्त  आने पर उड़ कर 
मैंने उस अल्हड़  भवर सा अपनी ही मंज़िल को पाया है 


उँगलियाँ भी उठती थी 
और सवालों का ढ़ेर भी खड़ा था 
साथी भी कम थे 
और दुश्मनों का हुजूम जमा था 

पर अपनी मस्ती  में मदमस्त शहज़ादे को 
कहाँ भला किसी का डर था 
कह लो  कुछ भी मुझे क्या परवाह 
मिजाज़ से मैं आवारा हूँ, आवारा ही था 

||Sshree|| 
कभी हसाती  हैं कभी रुलाती हैं 
पर यादें इतनीआसानी से 
भुलाई भी तो नहीं जाती हैं 

चुपके से दिल पर दस्तक़ दे कर 
जाने कब वो वहीं  घर कर जाती हैं 
धुंधले चेहरों और बिसरि बातों में 
मानो दुनियाँ तुम्हारी वहीं थम सी जाती है 

कल के बंद दरवाजे तभी  चीख के तुम्हें बुलाते हैं 
मन ही मन मुस्कुराते हुए 
आँसू भी भर से आते हैं 
मूड कर उन्हें देखने के लिए भी 
कुछ लम्हें कम  पड़ जातें हैं 
मुश्किल तो बहुत  होती है 
पर आँखें सीधी  कर बेबस कदम फिर आगे बढ़ जाते है 

वो ज़ोरो से जकड़ी हुई मुट्ठी शायद 
कल को जितना हो सके जकड़ना चाहती है 
वो रेशम से एहसास और कही-अनकही बातें 
इस मुश्किल सफर में बस वही अपने साथी हैं 

रह रह कर यूँ उन लम्हों को फिर से जीने की कसक 
मन को यूँ हर पल तरसती है 
पर यादें इतनी आसानी से 
भुलाई भी तो नहीं जाती हैं 

||Sshree|| 
चलते चलते से लम्हें 
ठहरी ठहरी सी साँसें 
रोक ना पाए क्यों इन्हें 
अपनी ही बाजुए ज़रा  भी 

थम जा कहती हैं आहें 
रुक जा कहे भरी निगाहें 
क्यूँ  तोड़ ना  पाए बंधन 
इस बेबसी के मन ज़रा भी 

बिछड़ते हाथों की कपकपाहट 
धूमिल चेहरों की चाहत 
अनकहे से वो जज़्बात 
अनसुने से वो अलफ़ाज़ 

चिल्लाये ज़िन्दगी बस एक पल 
दे दे तू मुझे उधर 
छू लेने दे उन हाथों को 
जिन्हें थामे हुई उम्र की शाम 
चुम लेने दे उस चेहरे को 
 जिसको नज़र हुई मेरी पहचान 

खो भी जाने दे उन बाँहों में 
जिसकी गहराइयो ने हर तकलीफ को भुला दिया 
बह जाने दे उस आवाज़ में 
जिसने हर सन्नाटे में सुरो सा एहसास दिया 

ना सुना ज़िन्दगी ने कुछ 
और हम सफर करते रह गए 
नामुमकिन सी तम्मनाओं का 
यूँ हश्र देखते रह गए 

भाग पड़े हैं आज फिर 
उसी समय के साथ 
अपने जाते गए दूर 
और रास्ते हमसफ़र बनते रह गए 
||Sshree|| 
कभी ख़ामोशी ही ज़ुबाँ बन जाए 
किसी का साथ जीने की आस बन जाए 
अजीब होती है ये जज्बातों  की कश्मकश 
कभी दूर रह कर भी नजदीक हो और कभी पास रह कर भी दूर का ख़्वाब बन जाए 


नज़र आते है हर मंज़र पर 
अनजाने से कई चेहरे 
जाने फिर कैसे वो अपने साए सा एहसास दिलाए 
बातों बातों में यू कभी 
मिल जाये दिल ऐसे 
के सदियों से बेचैन रूह जन्नत सा सुकून पा जाए 

चाह कर भी कभी तो 
ना पा सके लोग अपनों को 
और कभी अनजाने में अटूट कुछ रिश्तें बन जाए 
अज़ीब ये राहें हैं 
और अनोखे इसके अंदाज़ 
कभी भीड़ में तन्हा करे और कभी एक शख़्स पूरा जहान बन जाए 

||Sshree|| 

Thursday, 2 November 2017

ख्वाहिशों की कोई ज़ुबाँ ढूंढ़ लाऊ 
दिल कहे आज ये जहान भूल जाऊ 

रुक रुक कर चलती इस ज़िन्दगी को
आज कुछ पर दे के हसीन बनाऊँ 
आँखों में हर पल खिलते ख्वाबों को 
अपनी तमन्नाओं के रंगों से आज सजाऊ 
तोड़ ही दू आज ख़ामोशी  को 
अपने दिल की हर बात खुल के सुनाऊँ 
आरज़ूओं को मेरी मुस्कुराने दू ज़रा 
आज इस लम्हे बस जी जाऊँ 

गुनगुनाते उस बंजारे सा 
बावरा मन हो चला न मंजिल पता न  कदमों की ख़बर 
कुछ आवारा सा हो चला 

चलता है किस धुन में आज 
क्या कहूं  कुछ जानू ना 
अनजाने अंदाज़ देख 
आज खुद ही खुद को  पहचानू ना 

 सूरज की तपन और  सर्दी की   सिहरन 
में मदमस्त हो झूमता फिरे 
फासलों की तड़प और जखमों के निशान 
पर हँस  कर ये गुमां करे 

हँसता है ज़माना इसके दीवानेपन  पर 
पर आज ये ज़माने पे हँसता कहे 
दौड़ती दुनिया की दौड़ के बाशिंदो 
बिन जुनून तुम जिये भी तो क्या जिये 

|| Sshree ||