Thursday, 2 November 2017

ख्वाहिशों की कोई ज़ुबाँ ढूंढ़ लाऊ 
दिल कहे आज ये जहान भूल जाऊ 

रुक रुक कर चलती इस ज़िन्दगी को
आज कुछ पर दे के हसीन बनाऊँ 
आँखों में हर पल खिलते ख्वाबों को 
अपनी तमन्नाओं के रंगों से आज सजाऊ 
तोड़ ही दू आज ख़ामोशी  को 
अपने दिल की हर बात खुल के सुनाऊँ 
आरज़ूओं को मेरी मुस्कुराने दू ज़रा 
आज इस लम्हे बस जी जाऊँ 

गुनगुनाते उस बंजारे सा 
बावरा मन हो चला न मंजिल पता न  कदमों की ख़बर 
कुछ आवारा सा हो चला 

चलता है किस धुन में आज 
क्या कहूं  कुछ जानू ना 
अनजाने अंदाज़ देख 
आज खुद ही खुद को  पहचानू ना 

 सूरज की तपन और  सर्दी की   सिहरन 
में मदमस्त हो झूमता फिरे 
फासलों की तड़प और जखमों के निशान 
पर हँस  कर ये गुमां करे 

हँसता है ज़माना इसके दीवानेपन  पर 
पर आज ये ज़माने पे हँसता कहे 
दौड़ती दुनिया की दौड़ के बाशिंदो 
बिन जुनून तुम जिये भी तो क्या जिये 

|| Sshree || 

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