ख्वाहिशों की कोई ज़ुबाँ ढूंढ़ लाऊ
दिल कहे आज ये जहान भूल जाऊ
रुक रुक कर चलती इस ज़िन्दगी को
आज कुछ पर दे के हसीन बनाऊँ
आँखों में हर पल खिलते ख्वाबों को
अपनी तमन्नाओं के रंगों से आज सजाऊ
तोड़ ही दू आज ख़ामोशी को
अपने दिल की हर बात खुल के सुनाऊँ
आरज़ूओं को मेरी मुस्कुराने दू ज़रा
आज इस लम्हे बस जी जाऊँ
गुनगुनाते उस बंजारे सा
बावरा मन हो चला न मंजिल पता न कदमों की ख़बर
कुछ आवारा सा हो चला
चलता है किस धुन में आज
क्या कहूं कुछ जानू ना
अनजाने अंदाज़ देख
आज खुद ही खुद को पहचानू ना
सूरज की तपन और सर्दी की सिहरन
में मदमस्त हो झूमता फिरे
फासलों की तड़प और जखमों के निशान
पर हँस कर ये गुमां करे
हँसता है ज़माना इसके दीवानेपन पर
पर आज ये ज़माने पे हँसता कहे
दौड़ती दुनिया की दौड़ के बाशिंदो
बिन जुनून तुम जिये भी तो क्या जिये
|| Sshree ||
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