कुछ कहना है कुछ सुनना है
कभी कुछ कर जाना है कभी थम जाना है
लोग क्या कहेंगे ' इसकी जकड में
मुझे अब और नहीं रहना है
कभी दौड़ती हुई दुनिया के साथ दौड़
चीते सा सबको पछाड़ जाना है
कभी उसी दौड़ में इठलाते हुए चल कर
सबको खुद से आगे देख मुस्काना है
कभी लड़ लड़ कर मर जाना है
कभी ख़ामोशी से हार कर किसी और को जिताना है
उस मासूम परिंदे की तरह फिर
आसमान में एक नयी ऊंचाई को पाना है
कभी तारा बन कर जगमगाना है
और कभी टूट कर धूमिल हो जाना है
फिर गिर कर उठना और उठ कर सम्हल जाना है
कुछ खोना है कुछ पाना है
'लोग क्या कहेंगे ' इसकी जकड से आज़ाद हो
मुझे बेबाक हो कर जीना है
||Sshree||
No comments:
Post a Comment