कभी ख़ामोशी ही ज़ुबाँ बन जाए
किसी का साथ जीने की आस बन जाए
अजीब होती है ये जज्बातों की कश्मकश
कभी दूर रह कर भी नजदीक हो और कभी पास रह कर भी दूर का ख़्वाब बन जाए
नज़र आते है हर मंज़र पर
अनजाने से कई चेहरे
जाने फिर कैसे वो अपने साए सा एहसास दिलाए
बातों बातों में यू कभी
मिल जाये दिल ऐसे
के सदियों से बेचैन रूह जन्नत सा सुकून पा जाए
चाह कर भी कभी तो
ना पा सके लोग अपनों को
और कभी अनजाने में अटूट कुछ रिश्तें बन जाए
अज़ीब ये राहें हैं
और अनोखे इसके अंदाज़
कभी भीड़ में तन्हा करे और कभी एक शख़्स पूरा जहान बन जाए
||Sshree||
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