Friday, 3 November 2017

कभी ख़ामोशी ही ज़ुबाँ बन जाए 
किसी का साथ जीने की आस बन जाए 
अजीब होती है ये जज्बातों  की कश्मकश 
कभी दूर रह कर भी नजदीक हो और कभी पास रह कर भी दूर का ख़्वाब बन जाए 


नज़र आते है हर मंज़र पर 
अनजाने से कई चेहरे 
जाने फिर कैसे वो अपने साए सा एहसास दिलाए 
बातों बातों में यू कभी 
मिल जाये दिल ऐसे 
के सदियों से बेचैन रूह जन्नत सा सुकून पा जाए 

चाह कर भी कभी तो 
ना पा सके लोग अपनों को 
और कभी अनजाने में अटूट कुछ रिश्तें बन जाए 
अज़ीब ये राहें हैं 
और अनोखे इसके अंदाज़ 
कभी भीड़ में तन्हा करे और कभी एक शख़्स पूरा जहान बन जाए 

||Sshree|| 

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