चलते चलते से लम्हें
ठहरी ठहरी सी साँसें
रोक ना पाए क्यों इन्हें
अपनी ही बाजुए ज़रा भी
थम जा कहती हैं आहें
रुक जा कहे भरी निगाहें
क्यूँ तोड़ ना पाए बंधन
इस बेबसी के मन ज़रा भी
बिछड़ते हाथों की कपकपाहट
धूमिल चेहरों की चाहत
अनकहे से वो जज़्बात
अनसुने से वो अलफ़ाज़
चिल्लाये ज़िन्दगी बस एक पल
दे दे तू मुझे उधर
छू लेने दे उन हाथों को
जिन्हें थामे हुई उम्र की शाम
चुम लेने दे उस चेहरे को
जिसको नज़र हुई मेरी पहचान
खो भी जाने दे उन बाँहों में
जिसकी गहराइयो ने हर तकलीफ को भुला दिया
बह जाने दे उस आवाज़ में
जिसने हर सन्नाटे में सुरो सा एहसास दिया
ना सुना ज़िन्दगी ने कुछ
और हम सफर करते रह गए
नामुमकिन सी तम्मनाओं का
यूँ हश्र देखते रह गए
भाग पड़े हैं आज फिर
उसी समय के साथ
अपने जाते गए दूर
और रास्ते हमसफ़र बनते रह गए
||Sshree||
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