Friday, 3 November 2017

मिजाज़ से मैं आवारा हूँ आवारा ही था 

इन तंग गलियों में मैंने कब सुकून पाया है 
शरीफों के बीच झूठी शराफ़त में मैंने ख़ुद को खोया खोया पाया है 

मैं  तो  परिंदा हूँ 
जिसने आज एक डाल को अपनाया है 
फिर छोड़ कर उस  डाल  को 
आसमान में घर बनाया है 

खोखले समाज और उसकी बातों का 
मैंने खुल के मज़ाक उड़ाया है 
नहीं हूँ मैं वो फूल जो हर वक़्त अपनी खुशबू बिखेरे 
कभी किसी से दिल से जुड़ा और वक़्त  आने पर उड़ कर 
मैंने उस अल्हड़  भवर सा अपनी ही मंज़िल को पाया है 


उँगलियाँ भी उठती थी 
और सवालों का ढ़ेर भी खड़ा था 
साथी भी कम थे 
और दुश्मनों का हुजूम जमा था 

पर अपनी मस्ती  में मदमस्त शहज़ादे को 
कहाँ भला किसी का डर था 
कह लो  कुछ भी मुझे क्या परवाह 
मिजाज़ से मैं आवारा हूँ, आवारा ही था 

||Sshree|| 

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