मिजाज़ से मैं आवारा हूँ आवारा ही था
इन तंग गलियों में मैंने कब सुकून पाया है
शरीफों के बीच झूठी शराफ़त में मैंने ख़ुद को खोया खोया पाया है
मैं तो परिंदा हूँ
जिसने आज एक डाल को अपनाया है
फिर छोड़ कर उस डाल को
आसमान में घर बनाया है
खोखले समाज और उसकी बातों का
मैंने खुल के मज़ाक उड़ाया है
नहीं हूँ मैं वो फूल जो हर वक़्त अपनी खुशबू बिखेरे
कभी किसी से दिल से जुड़ा और वक़्त आने पर उड़ कर
मैंने उस अल्हड़ भवर सा अपनी ही मंज़िल को पाया है
उँगलियाँ भी उठती थी
और सवालों का ढ़ेर भी खड़ा था
साथी भी कम थे
और दुश्मनों का हुजूम जमा था
पर अपनी मस्ती में मदमस्त शहज़ादे को
कहाँ भला किसी का डर था
कह लो कुछ भी मुझे क्या परवाह
मिजाज़ से मैं आवारा हूँ, आवारा ही था
||Sshree||
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